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Bansi Narayan :देवभूमि उत्तराखंड का अकेला ऐसा मंदिर जिसके कपाट मात्र एक दिन के लिए खुलते हैं, जानिए वजह


Bansi Narayan : उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ विकासखंड के कल्प गंगा घाटी या उर्गम घाटी में खूबसूरत बुग्यालों के मध्य में भगवान श्री हरि विष्णु का एक ऐसा मंदिर है जिसके कपाट साल में सिर्फ 1 दिन के लिए खोले जाते हैं और सूर्यास्त से पहले इस मंदिर के कपाट को फिर से पूरे 1 साल के लिए बंद कर दिया जाता है।

Bansi Narayan : 12 किलोमीटर का पैदल सफर तय करना होगा

संभवत: यह देवभूमि उत्तराखंड का अकेला ऐसा मंदिर है जो मात्र एक दिन के लिए खुलता है। भगवान श्री हरि के इस मंदिर का नाम है ” बंसी नारायण”। बंसी नारायण तक पहुंचने के लिए आपको बहुत ही दुर्गम रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है। यहां पहुंचने के लिए आपको बदरीनाथ हाईवे पर स्थित हेलंग नामक जगह से उर्गम घाटी तक 8 किलोमीटर की दूरी वाहन से तय करनी पड़ेगी। जिसके बाद फिर आपको यहां से भगवान बंसी नारायण के मंदिर तक 12 किलोमीटर का पैदल सफर तय करना होगा। दुर्गम रास्तों से होकर, दूर तक फैले मखमली घास के मैदानों को पार कर सामने नजर आता है प्रसिद्ध पहाड़ी शैली कत्यूरी में बना वंशीनारायण मंदिर।

समुद्र तल से लगभग 13000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है यह अद्भुत मंदिर। इस मंदिर का निर्माण 6 वीं सदी से लेकर 8 वीं सदी के मध्य माना जाता है। मान्यता यह भी है कि इस मंदिर का निर्माण पांडव काल में हुआ था।

मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर में साल के बाकी बचे सभी दिन देव ऋषि नारद भगवान नारायण की पूजा अर्चना करते हैं।मनुष्यों को सिर्फ एक ही दिन पूजा अर्चना करने का अधिकार है।

नागर शैली में बने 10 फीट ऊंचे इस मंदिर का गर्भगृह वर्गाकार है। इस मंदिर में भगवान श्री हरि विष्णु चतुर्भुज रूप में विराजमान है। सबसे खास बात यह है कि इस मूर्ति में भगवान विष्णु और महादेव शिव, दोनों के ही दर्शन होते हैं। वहीं, इस मंदिर में भगवान गणेश और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी मौजूद हैं।

आखिर किस दिन खुलते हैं मंदिर के कपाट?

यह देवभूमि उत्तराखंड का अकेला ऐसा मंदिर है जो मात्र एक दिन के लिए रक्षाबंधन के दिन खुलता है और कुंवारी कन्याओं के साथ ही विवाहिताएं वंशीनारायण को राखी बांधने के बाद ही भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं ।

रक्षाबंधन के दिन ही क्यों खुलते हैं कपाट?


वर्तमान पुजारी कलगोठ गांव के बलवंत सिंह रावत बताते हैं कि बामन अवतार धारण कर भगवान विष्णु ने दानवीर राजा बलि का अभिमान चूर कर उसे पाताल लोक भेजा। बलि ने भगवान से अपनी सुरक्षा का आग्रह किया। इस पर श्रीहरि विष्णु स्वयं पाताल लोक में बलि के द्वारपाल बन गए। ऐसे में पति को मुक्त कराने के लिए देवी लक्ष्मी पाताल लोक पहुंची और राजा बलि को राखी बांधकर भगवान को मुक्त कराया। किवदंतियों के अनुसार पाताल लोक से भगवान यहीं प्रकट हुए।

एक कहानी यह भी है कि बहुत दिनों तक जब भगवान श्री हरि के दर्शन माता लक्ष्मी को नहीं हुए तो, माता लक्ष्मी देव ऋषि नारद के पास बंसी नारायण जा पहुंची और उनसे भगवान नारायण का पता पूछा। तब देव ऋषि नारद ने बताया कि भगवान पाताल में राजा बलि के द्वारपाल बने हुए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि भगवान को वहां से मुक्त करने की एक ही युक्ति है कि आपको श्रावण पूर्णिमा को राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनसे भगवान विष्णु को मांग लेना होगा। लेकिन माता लक्ष्मी को पाताल लोक का रास्ता ज्ञात ना होने के कारण उन्होंने देव ऋषि नारद से भी अपने साथ चलने का आग्रह किया।

मान्यता है की देव ऋषि माता लक्ष्मी के साथ पाताल लोक चले जाने के कारण श्रावण पूर्णिमा को भगवान बंसी नारायण की पूजा नहीं कर पाए। उस दिन कलगोठ गांव के जाख पुजारी ने भगवान बंसी नारायण की पूजा संपन्न की। बस उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा वाले दिन यानी रक्षाबंधन के दिन कलगोठ के पुजारी कपाट खोल कर पूजा करते हैं और सूर्यास्त होते ही कपाट फिर से 1 साल के लिए बंद कर देते हैं।


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